पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले ED की बढ़ती सक्रियता, राजनीतिक गलियारों में उठे सवाल
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) की बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। ED का काम आर्थिक अपराधों की जांच, मनी लॉन्ड्रिंग और काले धन पर रोक लगाना है, लेकिन अक्सर उसकी कार्रवाई की टाइमिंग चुनाव से पहले होने के कारण विवादों में आ जाती है।
ताजा मामला I-PAC (Indian Political Action Committee) से जुड़ा है। ED ने 8 जनवरी को कोलकाता में I-PAC के कार्यालय और इसके निर्देशक प्रतीक जैन के घर छापेमारी की। यह कार्रवाई कोयला तस्करी और ₹2,742 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस से जुड़ी है। सीबीआई ने इस मामले में 27 नवंबर 2020 को FIR दर्ज की थी, और ED ने 28 नवंबर 2020 से जांच शुरू की थी। अब यह मामला पांचवें साल में है, लेकिन कार्रवाई बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुई है, जो राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है।
पिछले चार सालों में ED का चुनावी पैटर्न
पिछले चार सालों में ED ने कई बार पुराने मामलों में चुनाव से पहले बड़ी कार्रवाई की है:
- झारखंड: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी।
- दिल्ली: अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तारी।
- महाराष्ट्र: शिवसेना और एनसीपी से जुड़े मामलों में चुनाव से छह दिन पहले छापेमारी।
इन घटनाओं ने राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया। कई बार चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही दलों और सरकारों पर असर पड़ा।
अन्य राज्यों में ED की सक्रियता
- तमिलनाडु: शराब, रियल एस्टेट और शेल कंपनियों से जुड़े केस डीएमके के लिए चुनौती बने।
- असम: भाजपा सरकार के तहत विपक्षी कांग्रेस और AIUDF नेताओं पर कार्रवाई का डर।
- केरल: सोना तस्करी और सहकारी बैंक मामलों से LDF सरकार घिरी।
- पुडुचेरी: कारोबारी और राजनीतिक गठजोड़ पर निगरानी।
I-PAC और हवाला आरोप
I-PAC पर आरोप है कि ₹20 करोड़ हवाला के जरिए ट्रांसफर हुए। ED ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें राज्य सरकार पर जांच में बाधा डालने और सबूत नष्ट करने का आरोप लगाया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ED की कार्रवाई का चुनावी टाइमिंग अक्सर विवादों का केंद्र बनती है, जबकि एजेंसी का कहना है कि उसका काम केवल कानून के तहत जांच करना है और चुनाव से उसका कोई लेना-देना नहीं।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले ED की सक्रियता ने राजनीतिक दलों के बीच तनाव बढ़ा दिया है। इस पर जनता और राजनीतिक विशेषज्ञों की नजरें लगी हैं कि क्या यह कार्रवाई केवल कानूनी प्रक्रिया है या चुनावी संदर्भ में रणनीतिक कदम भी।