केवल पैसे बरामद होने से भ्रष्टाचार साबित नहीं होता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी की सजा निरस्त, आरोपी दोषमुक्त
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल रिश्वत की रकम बरामद हो जाना अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति को ठोस व वैध कानूनी साक्ष्यों से साबित करना अनिवार्य है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 10 हजार रुपये रिश्वत मामले में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया।
यह मामला बस्तर जिले के कोकनपुर में पदस्थ रहे तत्कालीन ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी बसंत कुमार सिखेरिया से जुड़ा है। उन पर आरोप था कि उन्होंने किसान मकसूदन से ट्यूबवेल सब्सिडी प्रकरण को आगे बढ़ाने के बदले 10 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। किसान की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने 18 मार्च 2015 को ट्रैप कार्रवाई कर आरोपी को रंगे हाथ गिरफ्तार किया था।
जांच के बाद विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), कांकेर में चालान पेश किया गया। ट्रायल के बाद विशेष कोर्ट ने आरोपी को धारा 7 पीसी एक्ट में 4 साल और धारा 13(1)(डी) सहपठित 13(2) में 5 साल की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
विशेष कोर्ट के फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि ट्यूबवेल सब्सिडी का प्रकरण पहले ही उच्च अधिकारियों को भेजा जा चुका था और आरोपी के पास सब्सिडी स्वीकृत करने की कोई अधिकारिता नहीं थी। कथित रिश्वत मांग के समय कोई कार्य लंबित नहीं था।
इसके अलावा, अभियोजन द्वारा पेश ऑडियो रिकॉर्डिंग बिना धारा 65-बी प्रमाणपत्र के प्रस्तुत की गई थी, जो कानूनन मान्य नहीं है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि कर दी थी।
हाईकोर्ट का अहम अवलोकन
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। केवल रकम की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही में गंभीर विरोधाभास हैं, ऑडियो साक्ष्य वैधानिक रूप से प्रमाणित नहीं है और ट्रैप कार्रवाई में प्रक्रियात्मक खामियां पाई गईं।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि जब रिश्वत की मांग ही संदेह के घेरे में हो, तो दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और आरोपी बसंत कुमार सिखेरिया को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।