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‘मिसेज देशपांडे’ वेब सीरीज: दमदार आइडिया के बावजूद कमजोर लेखन और निर्देशन ने कम किया असर

मुंबई। वेब सीरीज मिसेज देशपांडे को मनोवैज्ञानिक थ्रिलर के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन इसे लेकर दर्शकों और आलोचकों की प्रतिक्रिया मिलीजुली रही है। सीरीज में मुंबई में हो रही सिलसिलेवार हत्याओं और 25 साल पुराने केस के बीच के रहस्य को दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन कमजोर पटकथा और बिखरे निर्देशन के कारण सस्पेंस पूरी तरह प्रभावी नहीं बन पाया।

कहानी का केंद्र मिसेज देशपांडे है, जो पुराने हत्याकांडों की दोषी रह चुकी है और फिलहाल हैदराबाद की सेंट्रल जेल में बंद है। मुंबई में हो रही नई हत्याओं को कॉपीकैट अपराध मानते हुए पुलिस उसे जांच में शामिल करती है। हालांकि, मिसेज देशपांडे के इरादे पूरी सीरीज में संदेह के घेरे में रहते हैं।

अभिनय के मामले में माधुरी दीक्षित ने सादगी और ठंडे भावों के जरिए खौफ पैदा करने की कोशिश की, लेकिन कमजोर लेखन उनके अभिनय की पूरी क्षमता सामने नहीं आने दे पाया। सिद्धार्थ चांदेकर और प्रियांशु चटर्जी भी अपने-अपने किरदारों में संतुलित प्रदर्शन करते हैं, लेकिन पटकथा की कमजोरी उन्हें पूरी तरह उभार नहीं पाती। कविन दवे का रहस्यमय किरदार भी अधूरा रह जाता है।

निर्देशन में तेज़ी और कसाव की कमी नजर आती है। सिनेमैटोग्राफी और लोकेशन माहौल बनाने में मदद करती हैं, लेकिन कमजोर संपादन, असमान गति और ढीली पटकथा इन खूबियों को दबा देती हैं। कई जगह तार्किक चूकें भी कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं।

संगीत भी माहौल बनाने की कोशिश करता है, लेकिन डर और रोमांच को प्रभावी ढंग से उभारने में नाकाम रहता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मिसेज देशपांडे में मूल विचार नया और आकर्षक है, लेकिन कमजोर लेखन और निर्देशन के कारण यह मनोवैज्ञानिक थ्रिलर के रूप में पूरी तरह खरा नहीं उतरता। माधुरी दीक्षित और बाकी कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद सीरीज साधारण से ऊपर नहीं उठ पाई।

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