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बुधवार के दिन जरूर करें श्रीगणेश चालीसा का पाठ, दूर होगी जीवन की हर बाधा 

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में सबसे पहले भगवान गणेश (Lord Ganesha) की ही पूजा की जाती है, ताकि वह कार्य बिना किसी बाधा के पूरा हो सके। यही कारण है कि गणेश जी को ‘प्रथम पूज्य’ व ‘विघ्नहर्ता’ कहा जाता है। बुधवार का दिन गणपति जी की आराधना के लिए समर्पित है। ऐसे में आप इस दिन पर श्रीगणेश चालीसा (Shree Ganesh Chalisa) का पाठ करके भगवान गणेश जी की असीम कृपा प्राप्त कर सकते हैं। चलिए पढ़ते हैं श्री गणेश चालीसा। श्री गणेश चालीसा (Shree Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi) (दोहा) जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

श्री गणेश चालीसा

(दोहा)

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥


(चौपाई)

जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगंधित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजे।
चरण पादुका मुनि मन राजें॥

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्वविख्याता॥

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुढारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥


जन्म कथा

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।
पालना पर बालक स्वरूप ह्वै॥


शनि दृष्टि प्रसंग

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहऊ॥

पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

गिरिजा गिरी विकल ह्वै धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये।
काटि चक्र सो गज सिर लाये॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥


बुद्धि परीक्षा

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिणा कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरषे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बढ़ाई।
शेष सहस्रमुख सके न गाई॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥


(दोहा)

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सम्मान॥

सम्बंध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

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